केवल पहचान नहीं, इज्जत भी है जरूरी ( Not only recognizable, Ignorance is also necessary )

केवल पहचान नहीं, इज्जत भी है जरूरी ( Not only recognizable, Ignorance is also necessary )


जानकारी ( Information )

युवा वर्ग को कार्यस्थल पर अपनी पहचान बनाने से जुड़ी बहस काफी लंबे अरसे से चली आ रही है। इस बारे में कई तर्क रखे जाते हैं। कई लोगों का मानना है कि सेल्फ-प्रमोशन से आप जल्दी आगे जा सकते हैं, लेकिन कुछ का मानना है कि अपनी पहचान बनाना एक प्राकृतिक प्रक्रिया होती है, जिसके तहत धीरे-धीरे आगे बढ़ा जाता है। वे कहते हैं कि जो लोग खुद को उग्रता के साथ सामने लाते हैं, अक्सर नई जिम्मेदारियों के सामने आ जाने पर पिछड़ते दिखते हैं। जो भी हो, इसमें शक नहीं कि कार्यस्थल पर तेजी से सीनियर्स की नजरों में आने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति मुख्यत: खुद पर ही फोकस रखते हैं। इसलिए भी कई सीनियर्स ऐसे कर्मचारियों को सहयोग करने से कतराते हैं।

दरअसल यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसे हमें कई अलग-अलग कोणों से देखना पड़ेगा। यदि कोई व्यक्ति करियर की सीढ़ियां चढ़ना चाहता है तो उसे कुछ जरूरी गुण अपने अंदर समाहित करने होंगे। युवा कर्मियों को जरूरत होती है ऐसे गुर सीखने की, जो अच्छे लीडर की पहचान होते हैं। एक अच्छा लीडर कोई मिथक नहीं, सच्चाई है, और उसकी खूबियों पर अमल करने वाला ही एक स्थायी रफ्तार से अपनी पहचान बनाने में कामयाब होता है।

आमतौर पर कार्यस्थल दो तरह के गुटों में बंटा होता है : पहला, उग्र, अव्यवस्थित वर्ग और दूसरा, चुपचाप अपना काम करने वाला। यदि आप ध्यान दें तो पाएंगे कि चुपचाप अपना काम करने वाले लोगों के बारे में अन्य लोग अधिक जिज्ञासा दर्शाते हैं। उन्हें ही महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर विमर्श करने के लिए बुलाया जाता है।

यह जानना भी बेहद जरूरी है कि किसी पहचान बनाने वाले और सबसे इज्जत प्राप्त करने वाले व्यक्ति में अंतर होता है। अपनी पहचान बनाने से भी बड़ी बात है दूसरों का आदर प्राप्त करना। इसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति में मंच पर खुद को अकेले दिखाने का नहीं, बल्कि सम्मिलित भाव से काम करने का जज्बा हो। दूसरे शब्दों में, पहचान बनाने वाले और इज्जत प्राप्त करने वाले व्यक्ति में वही अंतर है, जो दिल और दिमाग में होता है। पहचान बनाने वाला व्यक्ति दूसरों के दिमाग में जगह बनाता है, जिसे समय के साथ भुलाया भी जा सकता है, परंतु सबकी इज्जत प्राप्त करने वाला व्यक्ति दूसरों के दिल पर राज करता है और दिल कभी नहीं भूलता।

कार्यप्रणाली की समझ ( Understanding of methodology )

यह जरूरी है कि अपने कार्यस्थल पर काम करने के तरीके को समझों। यह भी समझों कि वहां आपस में व्यवहार कैसा है और आपसे किस तरह की उम्मीद रखी जाती है। कार्यस्थलों पर कुछ मैनेजर्स औपचारिकता में यकीन रखते हैं, कुछ अनुशासन में और कुछ अनौपचारिक व्यवहार भी करते हैं। अपने बॉस के कार्य व्यवहार को ठीक से समझों और उसी के अनुसार खुद को ढालने की कोशिश करें।

मदद लेना-देना ( Get help )

करियर के मंच पर अपनी पहचान बनाने का एक बड़ा तरीका है दूसरों की मदद करना। इसमें केवल दूसरों के काम में मदद करना ही नहीं आता, बल्कि आप जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हों, उसमें भी जहां तक संभव व मान्य हो, दूसरों को शामिल करना चाहिए। दूसरों की मदद करना मूलत: आत्मविश्वास, टीमवर्क और संयुक्त लीडरशिप को इंगित करता है। वहीं दूसरों से मदद लेना, उन्हें उनके काम का श्रेय देना, आपके व्यक्तित्व के खुलेपन को दर्शाता है और इस प्रक्रिया में दोनों पक्ष एक दूसरे से सीखते हैं। जब सीनियर्स इस तथ्य पर गौर करते हैं कि आपके अंदर दूसरों की मदद करने की क्षमता है तो स्वत: ही आपकी पहचान  बनती है। इसका यह मतलब नहीं कि किसी नवोदित का मार्गदर्शक ही बना जाए, परंतु दोस्ताना व्यवहार खुद ही आपकी छवि के पक्ष में जाता है। यह सच है कि यदि आप दूसरों के लिए मौके बनाते हैं तो आपके भविष्य के लिए भी उतने ही दरवाजे खुलते हैं।

विशेषज्ञता ( Specialization )

यह जानना बहुत जरूरी होता है कि आपकी प्रतिभा किस रूप में काम में आ सकती है। इसलिए पहचान बनाने का एक तरीका है, अपने कार्य के किसी पक्ष विशेष पर विशेषज्ञता प्राप्त करना। आप उस बारे में सबके बीच में भी बात करें। अपने कार्य के जिस पक्ष पर आप विशेषज्ञता प्राप्त करना चाहते हैं, उस बारे में लिखने का भी प्रयास करें, जो सबकी नजरों में आए। सोशल मीडिया पर भी उसके बारे में विचार रखें। जवाब में आए अन्य व्यक्तियों की बातों पर भी ध्यान दें और उन्हें अपनी सोच का हिस्सा बनाएं। अपने कार्यस्थल पर उससे जुड़ी प्रेजंटेशन्स देना ठीक रहेगा। वहीं सेमिनारों और अन्य आयोजनों में भी उस बारे में मंच से बोलने का मौका न गंवाएं। यदि आप अपने करियर में जल्दी आगे बढ़ना चाहते हैं तो अपने विचार और मूल्यों में लगातार श्रीवृद्धि करते रहें।

सकारात्मक स्पर्धा ( Positive competition )

व्यवसाय के अच्छे दौर में कई बार संस्थान संतुष्टि के दायरे में फंस जाते हैं। सुरक्षात्मक तरीके से अपने काम में जुटे रहना अपनी पहचान बनाने के लक्ष्य में रुकावट बनता है। यह जरूरी है कि आप काम करने के पुराने तरीकों को चुनौती दें और बेशक इसके पीछे आपका मकसद काम को बेहतर तरीके से करना, नतीजों को जल्दी और रोचक तरीके से प्राप्त करना और सबकी परफॉरमेंस में इजाफा करना होना चाहिए। तो हालात बेशक पक्ष में हों, सकारात्मक टकराव भी आपको दूसरों की नजरों में लाता है, क्योंकि आप पुराने र्ढे को बदलने का काम हिम्मत के साथ करते हैं। इस प्रयास में संस्थान का विकास होता है और उसकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में भी वृद्धि होती है।

राजनीति! कभी नहीं!! ( Politics! never!! )

पहचान बनाने से जुड़ा पहला मंत्र होता है अपने कार्य पर पूरा फोकस करना। उन नतीजों को प्राप्त करने का प्रयास करना, जिनकी उम्मीद आप से की जाती है, साथ ही अपने कार्यस्थल और सहकर्मियों के बीच एक सकारात्मक असर छोड़ना। इस पूरी प्रक्रिया में अगर किसी एक चीज से बचना जरूरी है तो वह है राजनीति। एक जिम्मेदार कर्मचारी का दायित्व होता है कि वह अपने संस्थान के विकास, नवीकरण और उपस्थित अवसरों का पूरा लाभ उठाए। आगे बढ़ने और अपनी पहचान बनाने को तत्पर कई युवा कर्मी यह भी सोचते हैं कि कार्यस्थल पर खेमेबाजी और राजनीति उनके काम आएगी, पर ऐसा कभी नहीं होता। कार्यस्थल पर चल रही राजनीति की जानकारी रखना अलग बात है, परंतु उसमें घुस कर अपना हित साधना, मुसीबत को बुलावा देने के सिवा और कुछ नहीं। साथ ही यह भी जरूरी है कि बेकार की अफवाहों से दूर रहें। किसी भी आने वाले परिवर्तन की प्रक्रिया पर तभी कान देना ठीक होता है, जबकि उसकी आधिकारिक घोषणा हो जाए। इसलिए यदि आप नहीं चाहते कि आपकी इमेज नकारात्मक बने तो खुद को नकारात्मक असर से दूर रखना ठीक होगा और इसके बाद  ही आप अपने लक्ष्य तक पहुंच सकेंगे।

आप का सच ( Truth of you )

अपनी पुख्ता पहचान बनाने की दिशा में यह सबसे जरूरी है, जिस पर कम ही ध्यान दिया जाता है। यदि आप अपने नैसर्गिक रूप में ही काम करते हैं तो आपकी कार्यक्षमता में खुद-ब-खुद ही इजाफा होता चला जाता है। ऐसे में काम के दौरान आप आनंद भी लेते हैं और दूसरों पर भी इसका असर होता है। आपकी ऊर्जा संक्रामक हो जाती है, जिसकी जद में आपके सहकर्मी भी आ जाते हैं।

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